Saturday, 20 June 2020

21 जून, क्या है माया कैलेंडर का सच?!




क्या 21 जून को ख़त्म होगी दुनिया (🙄🤦🏻‍♀‍😆😆)

सेंट्रल अमेरिका में मैक्सिको बॉर्डर के पास ही एक देश है- ग्वाटेमाला। 1970 के दशक में ग्वाटेमाला में ज़मीन की खुदाई करने पर तिकाल नामक पूरा मंदिर निकला। आर्कियोलॉजिस्ट ने जब इस मंदिर की उम्र मालूम की तो हैरानी हुई क्योंकि ये करीब डेढ़ हजार साल पुराना था और फिर ग्वाटेमाला में कई और जगह ना सिर्फ मंदिर बल्कि पूरे के पूरे शहर मिले जिनका आर्किटेक्चर कमाल का था। 
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ये मायन सभ्यता के शहर थे। जो शहर मिले थे उनकी दीवारों पर कैलेंडर उकेरे गए थे। माया लोगों का दिन-रात, महीने, सालों की गणना करने का अपना तरीका था। इन्हीं कैलेंडरों को मायन कैलेंडर कहते हैं और इन्हीं से अब दुनिया के विनाश की भविष्यवाणी की जा रही है।
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इसी कैलेंडर को आधार बनाकर साल 2012 में भी दुनिया को डराया गया था। तब कहा गया था कि 21 दिसंबर 2012 को दुनिया खत्म हो जाएगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। तो कहा गया कि कैलेंडर पढ़ने में चूक हो गई।
मायन कैलेंडर चांद के मासिक च्रकों और सूरज के सालाना चक्रों की गणना करके बनाया गया है। इसमें 13 दिन, 20 दिन और 260 दिन का का वक्त गिना जाता है। 20 तरह के कैलेंडरों से वक्त गिना जाता है। इनमें से तीन कैलेंडर सबसे अहम हैं। एक लॉन्ग काउंट, दूसरा ज़ोल्किन और तीसरा हाब।
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इसमें हाब कैलेंडर के हिसाब से मायन सभ्यता में खेती होती थी। ज़ोल्किन कैलेंडर में 13-13 दिन की 20 अवधियां गिनी जाती हैं। ये धार्मिक रीति रिवाजों के लिए था और तीसरा कैलेंडर जिसे लॉन्ग काउंट यानी लंबी गिनती वाले कैलेंडर के हिसाब से ही अभी दुनिया का अंत बताया जा रहा है। इसमें 5,126 साल गिने जाते हैं। यानि मायन मान्यताओं के मुताबिक, ये मानव सभ्यता के चक्र की शुरुआत से लेकर अंत तक की अवधि है। अब इसी के हिसाब से कहा जा रहा है कि 21 जून 2020 को यानि आज दुनिया खत्म हो जाएगी। 
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दुनिया के खात्‍मे का यह दावा इस बात पर आधारित है कि ग्रेगोरिअन कैलेंडर को वर्ष 1582 में लागू किया गया था। उस समय साल से 11 दिन कम हो गए थे। ये 11 दिन सुनने में तो बहुत कम लगते हैं कि लेकिन 286 साल में यह लगातार बढ़ता गया है। कुछ लोगों का दावा है कि हमें वर्ष 2012 में होना चाहिए। इस दावे को वैज्ञानिक पाओलो तगलोगुइन के एक ट्वीट से और ज्‍यादा बल मिला है।
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वैज्ञानिक पाओलो तगलोगुइन ने अपने ट्वीट में कहा कि जुलियन कैलेंडर को अगर फॉलो करें तो हम तकनीकी रूप से वर्ष 2012 में हैं। ग्रेगोरिअन कैलेंडर में जाने से हमें एक साल में 11 दिनों का नुकसान हुआ। ग्रेगोरिअन कैलेंडर को लागू हुए 268 साल (1752-2020) बीत चुके हैं। इस तरह से अगर 11 से गुणा करें तो 2948 दिन होते हैं। 2948 दिन बराबर 8 साल होते हैं। हालांकि बाद में वैज्ञानिक पाओलो ने अपना ट्वीट डिलीट कर दिया। वैज्ञानिक पाओलो के ट्वीट के बाद अब लोगों का कहना है कि 21 जून 2020 दरअसल, 21 दिसंबर, 2012 है। 
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हालांकि ये उन लोगों का इंटरप्रटेशन है जिन्होंने ना तो इस कैलेंडर को बनाया और ना ही काम में लिया।
वर्ष 2020 में पृथ्‍वी पर महामारी आई है, जंगलों में आग लगी है और टिड्ड‍ियों का हमला हुआ है और अफ़वाह फैलाने वाले लोग क्रियाशील हो गए हैं।
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नेशनल ज्योग्राफिक की एक रिपोर्ट के मुताबिक, माया लोग नहीं मानते कि कैलेंडर पूरा होने से दुनिया खत्म हो जाएगी। उन्हें लगता है कि इसके बाद नए सिरे से एक युग की शुरुआत होगी यानि असल में ये फिर से एक भ्रामक दावा है। कॉन्स्पीरेसी थ्योरी देने वाले कुछ लोगों का काम है बस। वास्तव में दुनिया खत्म होने जैसा कुछ नहीं है।
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उधर, अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का कहना है कि इस दावे का कोई विश्‍वसनीय वैज्ञानिक आधार नहीं है। इस तरह के दावे के केवल फिल्‍मों, किताबों और इंटरनेट पर चल रहे हैं और लोगों के भ्रम पैदा कर रहे हैं, इनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।

तस्वीरें गूगल से साभार, 
Souce: Mayan Calendar Systems, Vol. 1 by Cyrus Thomas and Internet.
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Friday, 20 September 2019

यादों के झरोखों से - 01

असुरक्षा, असंतोष, असहिष्णुता। बाप रे! बड़े बड़े शब्द!
आप सबका भी लगभग रोज़ सामना होता होगा इनसे! चलिए इनको पतली गली से निकलने का order देते हुए आज आपके साथ एक सच्चा किस्सा share करती हूँ। पापा के एक जानकार थे (अब नहीं रहे). "सलाम भाई"। काम के सिलसिले में अक्सर अक्सर घर आते जाते रहते थे। अब चूंकि पापा उनको सलाम भाई बुलाते थे, तो पीछे पीछे हम भी सलाम भाई आये हैं, सलाम भाई नमस्ते..... वगैरह वगैरह कहा करते थे।
एक दिन मैंने पूछा - "मीठी ईद कब है?"
उन्होनें पूछा - "क्यों? सिवईयां खानी हैं?"
मैंने कहा -"ना। मीठा? बिल्कुल नहीं।"
वो हंस दिए।
कुछ ही दिन बाद मीठी ईद आई और ठीक ईद वाले दिन (घर और मेहमान छोड़कर) वो अपने स्कूटर पर आये और नीचे से ही आवाज़ लगाई, दौड़कर गई तो मेरे हाथों में स्टील का बड़ा सा टिफ़िन थमा कर बोले - "तुम्हारे लिए, चखना ज़रूर बिट्टो। पापा, मम्मी को नमस्ते कहना, आज जल्दी में हूँ, फिर आऊंगा।" और उनका स्कूटर घर्र घर्र की हमेशा वाली आवाज़ें करता आगे बढ़ चला। ऊपर आकर टिफ़िन खोला तो इलायची की खुशबू फैल गई। माँ के कहने पर taste करने के लिए थोड़ी सी सिवइयां लीं और हैरान रह गई। मीठा कम, किशमिश बिलकुल नहीं (जैसा मुझे पसंद) और ज़ायका? शानदार!
थोड़े दिन बाद वो घर आये तो माँ ने टिफ़िन में चूरमा रखते हुए कहा -"सिवइयों की क्या ज़रुरत थी?" वो बोले "भाभी ज़रुरत तो चूरमे की भी नहीं है, फिर भी आप प्यार से बच्चों के लिए दे रही हैं और मैं इनकार नहीं करूँगा।"
सबके चेहरों पे मुस्कराहट और उसके बाद lunch. और तबसे जब तक वो ज़िंदा रहे, हर साल मीठी ईद पर उनके यहां से सिवइयां आती रहीं और दीपावली पर हमारे यहां से मिठाई जाती रही।
लिखने का मकसद सिर्फ इतना सा है कि मेरे ज़ेहन में वो एक अच्छे शख्स और अच्छी याद के तौर पर ज़िंदा हैं। एक आम भारतीय के तौर पर उनको जितना मज़ा ईद के लज़ीज़ पकवानों को खाने खिलाने में आता था, उतना ही दीवाली पर मिठाइयां और होली की गुझियां खाने में। होली के रंगों और दीपावली के पटाखों से उन्हें ख़ासा लगाव था। हाँ अच्छे बुरे कई लोग मिले, जिनके बारे में बताती रहूंगी पर ये थी एक अच्छी याद, अच्छे इंसान की।
#Memoirs1

Sunday, 25 August 2019



माँ ने कहा था, 'लड़की हो'
वो तुमको पहले बरगलाएंगे,
फिर भी ना जो तुम सहमी,
वो कोई बुरा सा लांछन लगाएंगे।

माँ ने कहा था, 'सच्ची हो'
वो सच को सह नहीं पाएंगे,
अपने झूठ को सच कहलाने,
वो सब एकजुट हो जाएंगे।

माँ ने कहा था, 'सादा दिल हो'
वो विश्वास का जाल बिछाएंगे,
जब लगेगा तुम निश्चिंत सी हो,
तब वो कपटी घात लगाएंगे।

माँ ने कहा था, 'डरना नहीं'
वो हर बात पे ग़लत ठहराएंगे,
सच की राह पर डटी रहना,
वो तुमसे आंख न मिला पाएंगे।

माँ ने कहा था, 'शक्ति रूपा हो',
वो झुंड में घेरेंगे, गरियाएँगे,
विनम्र रहो पर झुकना मत,
वो तुमको झुका नहीं पाएंगे।
©Aditi
25.8.19

Saturday, 17 November 2018

"बस यूं हीं"


कुछ लिखना तुम प्यारा सा
जिसे पढ़कर मैं पुलकित सी रहूं
कुछ गढ़ना ऐसा न्यारा सा
मंद स्मित सी खिली रहूं।

शीत ऋतु की मादकता सा
मन मेरा आह्लादित हो
कुछ ऐसा संकेत भी हो
संकोच लाज से सिमटी रहूं।

नयनाभिराम आकर्षण मुझको
तनिक नहीं सुहाते हैं
तुम कहना लिखना "हम" जैसा
मैं तुम पर बली बली जाती रहूं।

उपवन की सुगंधी मनभावन
तुमको खींच पास बुलाएगी,
तुम तनिक न रुकना पथिक मेरे,
मैं निरख निरख इठलाती रहूं।

©Aditi"

Monday, 21 August 2017

शांत अकेली रात में...

शांत अकेली रात में.........
तुम्हारी तस्वीर से अपनी तस्वीर जोड़ना
एक ख़याल से अपनी सोच जोड़ना
और अपने आप पर हँस देना।
कुछ अनकहे वादों को सुनना
अपनी हथेली पर तुम्हारा नाम लिखना
फिर उसे झेंपकर मिटा देना।
ज़बान पर तुम्हारे शब्दों की मिश्री रखना
मिठास में भी कड़वाहट को अनुभव करना
और उस स्वाद को उगल देना।
दिन में सपनों की डोर को बुनना
शाम पड़े उस डोर से अपनेआप बंधना
फिर रात में उसे समूचा उधेड़ देना।
अक़्सर मिटाने से हथेलियों का लाल पड़ना
उधेड़ने से सोच का और उलझना
और कुछ दिखाई या सुनाई न देना।
रात से सुबह तक बेहोश सा जगना
सुबह टूटे फूटे अधूरे सपनों को समेटना
फिर नियति को मौन स्वीकृति देना।
- अदिति (अदा)

Thursday, 10 August 2017

"सुनो"!

आज यादों के एलबम के कुछ पन्ने पलटे
धुंधले चेहरों की भीड़ में तुम दिखाई पड़े।
अपने अंदाज़ में तंज़ कसते हुए तुमने पूछा,
सुनो अदा, आजकल क्या करती हो?

आज भी तुम्हें कोई जवाब नहीं दिया,
न सकपकाई न आँसू कोई छलकने दिया।
पर सोचा आज गिनवा ही दूँ तुम्हें
कि मैं क्या हो गई हूँ और क्या करती हूँ।

"सुनो", मैं दिन भर अपने काम में खटती हूँ,
बिना किसी बैसाखी के ज़ख़्मी पैरों से चलती हूँ।
जो नोच डाले थे तुमने बेदर्दी से एक रोज़,
मैं आजकल उन पंखों पर रोज़ मरहम करती हूँ।

मैं लोगों से मिलती हूँ, हंसती हूँ, मुस्कुराती हूँ,
अपने ज़ख्मों से रिसते ख़ून को बख़ूबी छुपाती हूँ।
तुम्हारे हाथों पर लगे छींटों को हटाने के लिए,
मैं ख़ुद सज़ायाफ्ता मुजरिम सी हो जाती हूँ।

रात भर जागती हूँ, कभी डर के कभी सोच में गुम,
मैं तार तार हुए दिल को रफ़ू करती जाती हूँ।
शब भर यादों में क़ैद और रिहा होते होते, अल सुबह,
मैं तुम्हारे झूठे वादों के लिहाफ ओढ़ सो जाती हूँ।

जब तन्हाई की ठंड से मेरी हड्डियाँ गलने लगती हैं,
मैं ख्वाबों की रज़ाई में एक और पैबन्द लगाती हूँ।
जो सिखाया ज़िन्दगी ने मैं अक़्सर वही सबक़ दोहराती हूँ।
तुम आज भले शर्मिंदा हो, मैं तुम्हें मुआफ़ न कर पाती हूँ।


Saturday, 29 July 2017

'इंतज़ार थोड़ा और सही'

अभी तो कुछ सांसे हैं बाकी, नब्ज़ भी मेरी चलती है,
अभी ये दिल धड़कता है, पलकें भी तो झपकती हैं,
अभी तो मैं मुस्काती हूँ, तुम से दर्द छुपाती हूँ,
अभी तुम मत आ जाना, अभी तक ज़िंदा कहलाती हूँ।

आँखें हैं पर नींद नहीं, कुछ सपनों का साथ है,
तुमने तोड़ा हरपल जिसको, वही ज़ख्मी आस तो है,
एक ही मैं और लाखों हज़ारों, नश्तर जैसी बातें हैं,
सब सुनकर और सहकर, देखो मैं जिये जाती हूँ।

तुम अपने ना हुए कभी, बेगानों से क्या शिक़वा करूँ,
तुम तक राह वो नहीं गई, कोई रास्ता मन्ज़िल ना हुआ,
जाने कब किस रंग से कैसे, तस्वीर तुम्हारी बननी है,
लाखों फैले बिखरे हैं बस पेशनगोई ना समझ पाती हूँ।

कुछ दिन कुछ पल और सही फिर ये साँसें उखड़ेंगीं,
मेरी आस की लड़ियाँ भी तब इक इक करके बिखरेंगी,
तुम ना आना उस पल भी, तुम्हें दुनिया जहान से कहाँ फुर्सत,
उस रोज़ तो रस्म अदा होगी, मैं हर रोज़ ये लाश उठाती हूँ।

भूल जाना उस पल में, मेरी हर आहट और छुअन को तुम,
मैं इक लम्बे सफ़र की ऊब से थककर नए सफ़र की मुरीद हुई,
इंतज़ार थोड़ा और सही, हाँ थोड़ा और सही मत कहना अब,
बहुत हुआ, सुनो! अब मैं उस दुनिया को ही चली जाती हूँ।